सहारनपुर : सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण के दो दिन बाद अब मस्जिद पक्ष के वकील नौशाद अली ने पूरे मामले को लेकर चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने जिला प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वकील का आरोप है कि अदालत के आदेश की गलत व्याख्या करते हुए मस्जिद का पूरा स्ट्रक्चर ही ध्वस्त कर दिया गया, जबकि उनके मुताबिक अदालत से केवल बेदखली का आदेश आया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मामले में सत्ता के दबाव में फैसला प्रभावित किया गया।
मस्जिद पक्ष के वकील नौशाद अली ने कहा कि जिला कोर्ट से जो आदेश आया था, उसे प्रशासन ने जिस तरह लागू किया, वह आदेश के विपरीत है। उनके मुताबिक मस्जिद पक्ष के पास केवल बेदखली का आदेश आया था, लेकिन प्रशासन ने बेदखली की कार्रवाई करने के बजाय मस्जिद का पूरा स्ट्रक्चर ही हटा दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्ट्रक्चर हटाने का कोई आदेश नहीं था तो प्रशासन ने इसे क्यों ध्वस्त किया, इसका जवाब प्रशासन को देना चाहिए।
नौशाद अली ने कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के मलबे के नीचे मिली कुएं जैसी संरचना को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने दावा किया कि इससे यह संकेत मिलता है कि इस स्थान पर पुरानी मस्जिद मौजूद रही होगी। उनका कहना है कि पहले मस्जिदों में नमाज से पहले वजू के लिए कुएं के पानी का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, इस संरचना के वास्तविक स्वरूप और इतिहास को लेकर पुरातत्व विभाग की जांच अभी जारी है।
नौशाद अली ने कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के मलबे के नीचे मिली कुएं जैसी संरचना को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने दावा किया कि इससे यह संकेत मिलता है कि इस स्थान पर पुरानी मस्जिद मौजूद रही होगी। उनका कहना है कि पहले मस्जिदों में नमाज से पहले वजू के लिए कुएं के पानी का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, इस संरचना के वास्तविक स्वरूप और इतिहास को लेकर पुरातत्व विभाग की जांच अभी जारी है।
वकील ने प्रशासन के उस पक्ष पर भी सवाल उठाया, जिसमें कथित तौर पर इस स्थान को विश्राम कक्ष बताया गया था। उन्होंने कहा कि यदि सरकार का दावा है कि यह जगह मूल रूप से विश्राम कक्ष थी, जहां बाहर से आने वाले लोग ठहरते थे और बाद में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने यहां नमाज पढ़ना शुरू कर दिया तथा इसे मस्जिद का स्वरूप दे दिया, तो फिर सवाल यह है कि प्रशासन ने अपनी ही बताई गई इमारत को ध्वस्त क्यों कर दिया। नौशाद अली का कहना है कि अदालत के आदेश के अनुसार मस्जिद पक्ष के पास अपना पक्ष रखने के लिए 24 दिन का समय बचा हुआ था। उनके मुताबिक इस अवधि के समाप्त होने से पहले बेदखली की कार्रवाई भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन प्रशासन ने जल्दबाजी में संपत्ति को ही ध्वस्त कर दिया।
जमीन के मालिकाना हक को लेकर भी मस्जिद पक्ष के वकील ने प्रशासन के दावे पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अदालत में यह दावा मस्जिद पक्ष ने नहीं, बल्कि प्रशासन यानी सरकार ने किया था कि संबंधित जमीन सरकारी संपत्ति है। ऐसे में जमीन पर मालिकाना हक साबित करने की जिम्मेदारी भी सरकार की थी। नौशाद अली के मुताबिक जिस एक्ट के तहत सरकार ने जमीन पर अपना दावा किया, उसमें संपत्ति पर अधिकार साबित करने के लिए कई आधार हो सकते थे। पहला आधार यह था कि सरकार यह बताए कि इस संपत्ति का मालिक कौन है और उसके समर्थन में संबंधित दस्तावेज या नोटिफिकेशन पेश करे। उनका कहना है कि सरकार ऐसा कोई ठोस सबूत या नोटिफिकेशन पेश नहीं कर पाई।
उन्होंने दूसरा आधार जमीन के अधिग्रहण का बताया। वकील के अनुसार यदि सरकार जमीन को अधिग्रहित किए जाने का दावा करती है तो उसके समर्थन में अधिग्रहण की कार्रवाई और उससे जुड़े दस्तावेज होने चाहिए थे, लेकिन मस्जिद पक्ष के मुताबिक यहां ऐसा कोई अधिग्रहण रिकॉर्ड या मामला सामने नहीं आया। तीसरे आधार के तौर पर उन्होंने लीज का उल्लेख किया। नौशाद अली का कहना है कि यदि जमीन सरकार की लीज पर थी तो उसका भी रिकॉर्ड होना चाहिए, लेकिन इस मामले में लीज का कोई आधार नहीं है। ऐसे में उनका आरोप है कि सरकार के पास जमीन पर मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं थी।
वकील ने कहा कि जब सरकार ने खुद जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया था तो उसे अदालत में यह साबित करना चाहिए था कि वह जमीन उसकी कैसे है। उनके मुताबिक यदि सरकार मालिकाना हक साबित नहीं कर पाई तो उसका दावा सवालों के घेरे में आता है। मस्जिद पक्ष पर लगाए गए करीब 6 करोड़ 41 लाख रुपये के जुर्माने को लेकर भी नौशाद अली ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जुर्माना लगाने के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित पक्ष ने जमीन पर कब से कब्जा किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कब्जे की कोई निश्चित तारीख ही दर्ज नहीं की गई तो जुर्माने की रकम की गणना किस आधार पर की गई।
वकील ने कहा कि मस्जिद पक्ष अदालत के आदेश को चुनौती देने और कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है। उनका कहना है कि मस्जिद पक्ष का दावा यह नहीं है कि अदालत का कोई आदेश आया ही नहीं, बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि जिस आदेश के आधार पर कार्रवाई की गई, उसके दायरे से आगे जाकर मस्जिद का स्ट्रक्चर ध्वस्त कर दिया गया। फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के मलबे के नीचे मिली कुएं जैसी संरचना को लेकर भी जांच जारी है। पुरातत्व विभाग की टीम मौके का निरीक्षण कर चुकी है और प्रथम दृष्टया इसे कूप यानी कुएं जैसी संरचना माना गया है, हालांकि विभाग ने अभी इसे पूरी तरह कुआं होने की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में इस संरचना की वास्तविक उम्र, उपयोग और इतिहास सामने आने के बाद ही मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
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